ए जिंदगी मैं तेरी बारिश की हर बूंद में जीना चाहती हूं, जी भर के भींगना चाहती हूं,नाचना चाहती हूं,गिरना चाहती हूंं और न जाने क्या-क्या करना चाहती हुं? मगर तेरी ये कड़कती बिजलियाँ रोकती है मुझे,मुझमें डर पैदा करती है,कहती है कि तू घर में कैद रह वहाँ तेरे लिए सारी सुविधाएं मौजूद है,वहां तुझे बिल्कुल भी तकलीफ नहीं होगी। तेरी जिंदगी इससे बाहर नहीं है ,यह एक घर से शुरू होकर दूसरे किसी बंद आंगन में खत्म होगी। वह घर भी तेरा नहीं होगा वहाँ तू महज एक सामान की तरह रहेगी। जब तक खामोश किसी कोने में पड़ी रहेगी तब तक तो रहेगी मगर जैसे ही तेरे लब ने आवाज निकाली कि तू बाहर फेंक दी जाएगी।
पेशावर से कलकत्ता, जरनैली सड़क- जीटी रोड
"ज़िंदगी से जो निकल गया वो सुकून है और ज़िंदगी में जो दाख़िल हुआ वो तसदुद्द है, इज़्तिराब है और बेयक़ीनी है. तसदुद्द का ये हाल कि क्लशनिकोव राइफ़लें 100 रुपये रोज़ किराए पर मिल रही हैं, लोग अपने घरों में बम बना रहे हैं, घर की न चारदीवारी महफू़ज है न बाहर की खुली फ़जा. जो अंदर बैठे हैं, मुसल्ला डाकू उन्हें अंदर आकर लूट रहे हैं, जो बाहर निकले हैं, वो बाहर लूटे जा रहे हैं, लोग अपनी बात दलील से नहीं मनवा रहे हैं बल्कि कुव्वत के बल पर ज़लील कर के मनवा रहे हैं, हर फ़रीक़ कहता है बस मैं हक़ पर हूं, चुनाचे वो मरने-मारने पर नहीं बल्कि सिर्फ़ मारने पर तुला हुआ है. अब फ़ैसला पंचायतों और चौपालों में नहीं होता अब जो ताकतवर है, वो चाहता है कि शाम के झगड़े का रात के अंधेरे में ही तस्फ़िया हो रहे. इज़्तिराब का ये हाल है कि जैसे सब्र का यारा जाता रहा, जैसे अच्छे दिनों के इंतज़ार की सख़्त जाती रही. इंसान का जी तो हमेशा चाहता रहा कि यूं हो और यूं हो लेकिन आज का इंसान चाहता है कि यूं हो और अभी हो. ऐसा हो और रात भर में हो जाए. अगली सुबह नमूदार हो तो दौलत के अंबार लगे हों...जो भी होना है, अभी हो जाए.....
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें